लोक लुभावन घोषणा पत्र, अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती

गोविंद चतुर्वेदी भारतीय जनता पार्टी ने 17वीं लोकसभा के लिए अपना चुनावी घोषणा पत्र जारी कर दिया। कांग्रेस की तरह ही भाजपा के घोषणा पत्र में भी लोक लुभावन वादों पर जोर रहा। जिस तरह राजनीतिक दलों ने घोषणा पत्र जारी किए हैं वो देश की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती है।
संकल्प पत्र जारी करते समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ पार्टी अध्यक्ष अमित शाह , घोषणा पत्र बनाने वाली कमेटी के चेयरमैन राजनाथ सिंह , सुषमा स्वराज, अरुण जेटली समेत तमाम दिग्गज नेता मौजूद रहे। लेकिन जो बात राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी वो थी वरिष्ठ और बुजुर्ग नेताओं की कमी। दरअसल लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी समेत कई ऐसे नेता घोषणा पत्र जारी करने के दौरान नदारद रहे जो दर्शाता है कि शायद अब वे मार्गदर्शक मंडल का भी हिस्सा नहीं रहे।
बहरहाल बात भाजपा के घोषणा पत्र की करें तो इसमें चुनाव का असर तो दिखा ही लेकिन दो अप्रैल को कांग्रेस के जारी घोषणा पत्र की झलक भी नजर आई। कांग्रेस के घोषणा पत्र में जहां लोक लुभावन योजनाएं दिखीं वहीं भाजपा ने उससे दो कदम आगे बढ़कर घोषणाएं कर डालीं।
कांग्रेस ने जहां न्याय योजना के जरिये देश के 5 करोड़ गरीब लोगों को 72 हजार रुपए सालाने देने की घोषणा की वहीं भाजपा ने उसके जवाब में कम से कम चार पांच ऐसी योजनाओं की घोषणा कर नहले पर दहला मारने की कोशिश की। फिर चाहे वो दो हेक्टेयर तक के किसानों को 6 हजार सालाना राशि देने वाली भाजपा की पिछली घोषणा को आगे बढ़ाते हुए इसे बिना किसी भूमि सीमा के सभी किसानों पर लागू करना हो या फिर एक लाख रुपए तक के किसान क्रेडिट कार्ड से लिए कर्ज पर उनको ब्याज मुक्त करने की घोषणा। यही नहीं छोटे और सीमांत किसानों के लिए 60 वर्ष के बाद पेंशन की योजना, छोटे व्यापारियों के लिए पेंशन योजना, व्यापारियों के लिए अलग बोर्ड बनाने की योजना जैसे ऐलान भी कांग्रेस की लोक लुभावन योजनाओं को भाजपा के जवाब के तौर पर देखा जा सकता है। हालांकि कांग्रेस की माने तो काला धन, जीएसटी, रोजगार जैसे मुद्दों का जिक्रघोषणा पत्र में नहीं दिखा लेकिन भाजपा इसे सही नहीं मानती।
बड़ा सवालभाजपा के घोषणा पत्र में इस बात का जवाब नजर नहीं आता, इन सारी घोषणाओं के लिए पैसे का इंतजाम कैसे होगा? देश महंगाई, बेरोजगारी और अर्थव्यवस्था की दुराव्यवस्था से जूझ रहा है। सिर्फ किसानों के लिए क्रेडिट कार्ड पर ब्याज मुक्त योजना की बात करें तो इसमें ये जानना जरूरी होगा कि इस घोषणा के बाद कितने किसान गरीब के तौर पर बैंक पहुंचेंगे। और पहले से ही घाटे से जूझ रहे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक इन किसानों को कैसे संभालेंगे?
भाजपा के 12 श्रेणियों में बंटे इस संकल्प पत्र में कुल 75 संकल्प नाम रखे गए हैं। इन 75 संकल्पों को भारत की आजादी से जोड़ा गया है। भाजपा का मानना है वे इस संक्लप को 2022 तक पूरा करेंगे। लेकिन आतंक, राम मंदिर जैसे भावनात्मक मुद्दों को लेकर भी इस घोषणा पत्र में कोई साफ लाइन नहीं है।
बस आगे बढ़ने की होड़घोषणा पत्र में भी एक दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ दिखी। भाजपा के मुताबिक 2022 तक किसानों की आय दोगुनी होगी, राष्ट्रीय व्यापार आयोग बनाने की बात समेत देश की जनता से जुडे़ जितने भी पक्ष हो सकते हैं, उन्हें कांग्रेस की ही तर्ज पर भाजपा ने भी लिया है। कांग्रेस ने जहां 55 बिंदू बताए वहीं भाजपा ने 75 बिंदुओं में संकल्प लिया। 23 मई को लोक सभा चुनाव के नतीजे आएंगे और उस दिन साफ होगा कि जनता ने किसके घोषणा पत्र को सराहा और किसे नकारा। लेकिन अब तक कहीं फोकस, कहीं विविधता, कहीं राजनीति को साधने की कोशिश घोषणा पत्रों (कांग्रेस-भाजपा) में दिखी, लेकिन इन सब के बीच अर्थव्यवस्था जो देश की रीढ़ है वो कमजोर ही नजर आ रही है। जो दल सत्ता में आए उसे कड़े कदम उठाने होंगे।
तय हो जिम्मेदारीआने वाले समय में जो भी सरकार आए उसे ये भी तय करना चाहिए कि घोषणा पत्र कितने समय चुनाव से पहले आए जिससे जनता उनके बारे में अपना मन बना सके, उनको अपने नफा-नुकसान के पैमाने पर नाप सके। जो घोषणाएं की जाएं उनको लागू करने की भी सरकार में आने पर राजनीतिक दल की कानूनी जिम्मेदारी तय की जाए। जो दल सत्ता से जाए वो ये भी बताए कि उसने अपने घोषणा पत्र की कितनी योजनाएं लागू कीं। इससे न सिर्फ लोकतंत्र मजबूत होगा बल्कि देश की जनता और मतदाता भी मजबूत होंगे। (लेखक पत्रिका समूह के डिप्टी एडिटर हैं)