लोकसभा चुनाव: चुनावी चाल-सियासत बेमिसाल, दिग्गज नेताओं की अवसरवादी राजनीति

नई दिल्ली। लो फिर आया देश में चुनावी मौसम। यह शब्द जैसे ही कभी गूंजता या फिर इसकी चर्चा होती है, नेतागण सतर्क हो जाते हैं। हो भी क्यों न, क्योंकि इसके बाद देश में शुरू होता है राजनीति का ‘राजधर्म’। यह एक ऐसा धर्म है, जिसका तकरीबन सभी नेता पालन और अपने जीवन में अनुसरण करते ही करते हैं। हालांकि, यह एक बार नहीं बल्कि बार-बार होता है। देश में जब भी कभी चुनाव की घोषणा होती है, अवसरवादी राजनीति शुरू हो जाती है। 2019 लोकसभा चुनाव से पहले कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिल रहा है। मौके का फायदा उठाते हुए नेता दल-बदल की राजनीति कर रहे हैं और फायदे के लिए एक झटके में एक पार्टी से दूसरी पार्टी में छलांग लगा रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि केवल छुटभइए नेता ही इस राजधर्म का पालन नहीं करते, बल्कि नामचीन हस्तियां भी मिनटों में पाला बदल देती हैं। तो चलिए एक नजर डालते हैं 2019 लोकसभा चुनाव में अब तक किन-किन दिग्गजों ने इस राजनीतिक ‘राजधर्म’ का पालन किया।
हार्दिक पटेल (पाटीदार नेता से कांग्रेस में शामिल)
12 मार्च को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी और कांग्रेस महासिचव प्रियंका गांधी समेत कई दिग्गज नेताओं के सामने पाटीदार नेता हार्दिक पटेल ने गुजरात में कांग्रेस का दामन थाम लिया। काफी उठा-पटक के बाद हार्दिक पटेल ने कांग्रेस ज्वाइन किया। इसके लिए पाटीदार अनामत आंदोलन समिति (पीएएएस) ने भी हरी झंडी दे दी थी। गौरतलब है कि हार्दिक पर मेहसाना जिला की एक सत्र अदालत ने दंगा और आगजनी के मामले में दो साल की कैद की सजा सुनाई थी। यह घटना जिले के विसनगर कस्बे में 2015 में हुई थी। हालांकि, उनकी कैद की सजा पर अदलत ने रोक लगा दी, लेकिन उनकी दोषसिद्धि निलंबित नहीं की गई। पटेल ने निचली अदालत द्वारा खुद को दोषी करार दिए जाने के खिलाफ गुजरात उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर कर रखी है। फिलहाल, चर्चा यह है कि कांग्रेस हार्दिक पटेल को लोकसभा चुनाव लड़वा सकती है।
टॉम वडक्कन (कांग्रेस से भाजपा में शामिल)
केरल से कांग्रेस के दिग्गज नेता और पार्टी प्रवक्ता टॉम वडक्कन ने 14 मार्च को कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया। वडक्कन कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष और UPA की चेयरपर्सन सोनिया गांधी के पूर्व सचिव भी रह चुके हैं। टॉम ने यह कहते हुए कांग्रेस का साथ छोड़ दिया कि वह देश की सुरक्षा पर सवाल उठाती है।
सावित्री बाई फुले (भाजपा से कांग्रेस में शामिल)
उत्तर प्रदेश के बहराइच से भाजपा सांसद सावित्री बाई फुले ने दो मार्च (शनिवार ) को भाजपा से इस्तीफा देकर कांग्रेस का दामन थाम लिया। दलिता नेता की पहचान रखने वालीं सावित्री बाई फुले करीब एक साल से ज्यादा समय से भाजपा के खिलाफ आवाज उठाती रही थीं। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी को ‘दलित विरोधी’ भी करार दिया था। भाजपा पर अपनी उपेक्षा करने और समाज में बंटवारे की राजनीति करने का आरोप लगाते हुए उन्होंने पार्टी से इस्तीफा दे दिया था।
मनीष खंडूरी (उत्तराखंड के पूर्व भाजपा सीएम बीसी खंडूरी के बेटे)
(भाजपा से कांग्रेस में शामिल)
उत्तरखंड के पूर्व सीएम और भाजपा सांसद बीसी खंडूरी के बेटे मनीष खंडूरी शनिवार (16 मार्च ) को राहुल गांधी की उपस्थिति में भाजपा छोड़कर कांग्रेस का ‘हाथ’ थाम लिया। मनीष खंडूरी ने यह आरोप लगाया था कि उन्हें पार्टी से साइड लाइन कर दिया गया। मनीष खंडूरी का कहना था कि पिछले तीन सालों से पार्टी में उन्हें कोई जगह नहीं दी गई है। चर्चा यहां तक है कि उत्तराखंड में भाजपा दो खेमों बट गई है। लिहाजा, पार्टी के कई वरिष्ठ नेता हाईकमान से नाराज चल रहे हैं।
दानिश अली ( जेडीएस से बसपा में शामिल)
जनता दल सेक्यूलर (जेडीएस) के महासचिव दानिश अली शनिवार (16 मार्च ) को पार्टी से इस्तीफा देते हुए बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का दामन थाम लिया। दानिश अली ने कहा कि जब मैं जेडीएस में था तब भी कभी कुछ नहीं मांगा। यह तय करना एचडी देवगौड़ा जी के पास था कि मुझे क्या काम सौंपेंगे। बसपा ज्वाइन करने के बाद उन्होंने कहा कि बहन जी मुझे जो काम देंगी वह काम करूंगा। चर्चा यह है कि बसपा दानिश अली को यूपी से चुनाव लड़ा सकती है।
‘राजधर्म’ में अब किसकी बारी
इसके अलावा कुछ और बड़े नेता भी हैं, जो जल्द ही राजनीति का ‘राजधर्म’ का पालन करने वाले हैं। इनमें शत्रुघ्न सिन्हा, अल्का लांबा और सांसद श्याम चरण गुप्ता शामिल हैं। चर्चा यह है कि शत्रुघ्न सिन्हा अगामी 22 मार्च को कांग्रेस या आरजेडी का दामन थाम सकते हैं। वहीं, अल्का लांबा एक बार फिर कांग्रेस में शामिल हो सकती हैं। इसके श्यामा चरण गुप्ता, जो इलाहाबाद से भाजपा के सांसद हैं। इधर, समाजवादी पार्टी ने अगामी लोकसभा चुनाव के लिए बांदा से उन्हें अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया है। हालांकि, अभी तक उनके इस्तीफे की कोई खबर नहीं है। तो अब इन नेताओं के बाद कौन से दिग्गज नेता ‘राजधर्म’ का पालन करेंगे, यह देखने वाला होगा।