लहर न आंधी… इन सीटों ने कर लिया कमिटमेंट तो किसी की नहीं सुनतीं

अनंत मिश्रा
जयपुर। राजनीति हर पल बदलती रहती है। कभी कोई दल जीतता है, तो कभी कोई दूसरा। सत्ता में बैठे दलों को भी विपक्ष में भी बैठना पड़ता है। यही हाल लोकसभा की सीटों का है। कुछ सीटें चुनाव-दर-चुनाव अपना मिजाज बदलती रहती हैं, तो कुछ हैं कि एक ही दल का गढ़ बनकर रह गई हैं और उत्तरप्रदेश की मुजफ्फरनगर सीट मिजाज बदलने वाली ऐसी ही सीट है। 1999 के लोकसभा चुनाव में यहां कांग्रेस को जीत मिली तो 2004 के चुनाव में समाजवादी पार्टी ने जीत का परचम फहराया। पांच साल बाद हुए 2009 के लोकसभा चुनाव में बसपा के हाथी ने यहां सबको धूल चटाई तो 2014 के चुनाव में यहां भाजपा ने जीत का डंका बजाया।
उत्तरप्रदेश की फतेहपुर, मथुरा और जौनपुर सीटों की तासीर भी कुछ ऐसी ही रही है। फतेहपुर में 2004 में बसपा, 2009 में सपा तो 2014 में कांग्रेस जीती। यानी हर चुनाव में जीत नए दल को मिली। मथुरा में 2004 में कांग्रेस, 2009 में रालोद तो 2014 में भाजपा जीती। जौनपुर में भी 2004 में सपा, 2009 में बसपा तो 2014 में भाजपा जीती। राजस्थान की दौसा सीट भी रंग बदलने वाली रही है। 2004 में यहां कांग्रेस जीती तो 2009 में ये सीट निर्दलीय प्रत्याशी के हाथ लगी। 200 में यहां भाजपा ने बाजी मारी। लेकिन देश में कुछ सीटें ऐसी हैं जिन पर किसी तरह का असर नहीं होता। ये सीटें पिछले 7-8 चुनाव से एक ही दल के कब्जे में बनी हुई है। इनमें मध्यप्रदेश की विदिशा, भोपाल और इंदौर, गुजरात की गांधीनगर और सूरत तथा उत्तर प्रदेश की लखनऊ सीट है जहां पिछले 7-8 बार से भाजपा का कमल खिलता आ रहा है। इसी तरह मध्यप्रदेश की छिंदवाड़ा और प. बंगाल की मालदा सीट पर आम चुनाव में कांग्रेस परचम फहराती आ रही है। छिंदवाड़ा में 1997 के उपचुनाव को छोड़ दिया जाए तो कांग्रेस के कमलनाथ नौ बार और एक बार उनकी पत्नी जीत का डंका बजा चुकी हैं। इसी तरह उत्तर प्रदेश की मैनपुरी और कन्नौज समाजवादी पार्टी के गढ़ के रूप में पहचान बना चुकी है। तेलंगाना की हैदराबाद सीट एआईएमआईएम के किले के रूप में स्थापित हो चुकी है। देखना दिलचस्प होगा कि मतदाता इस बार इन सीटों पर किसे जिताते हैं।
ये भी पढ़ें: उत्तर कोरिया का दावा, दोस्ती की आड़ में हमला करने की साजिश में जुटा है अमरीका
विदिशा: मध्यप्रदेश की विदिशा सीट पर हुए दस लोकसभा चुनाव से भाजपा जीत का डंका बजाती आ रही है। ये वो सीट है जहां से भाजपा के शीर्षस्थ नेता रहे अटल बिहारी वाजपेयी, शिवराज सिंह चौहान और सुषमा स्वराज प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। इस बार कांग्रेस ने इस सीट से शैलेन्द्र पटेल को प्रत्याशी बनाया है जबकि भाजपा अभी प्रत्याशी चयन के मंथन में जुटी है।
भोपाल: मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल भी उन सीटों में शामिल है, जहां पिछले 8 चुनाव से कमल खिलता आ रहा है। इस सीट से भाजपा प्रत्याशी सुशील चंद्र वर्मा लगातार चार बार जीते। दो बार यहां से राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री रहे कैलाश जोशी तो एक बार उमा भारती जीतीं। पिछले चुनाव में भाजपा ने यहां तीन लाख 70 हजार मतों से जीत दर्ज की थी। कांग्रेस ने इस बार पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को यहां से उतारा है तो भाजपा प्रत्याशी की तलाश में जुटी है।
इंदौर: मध्यप्रदेश की इंदौर सीट भी ऐसी है, जहां पिछले 8 चुनाव से कांग्रेस जीत नहीं पाई है। लोकसभाध्यक्ष सुमित्रा महाजन यहां लगातार 8 बार से जीत दर्ज कराती आ रही हैं। पिछले चुनाव में महाजन ने कांग्रेस प्रत्याशी सत्यनारायण पटेल को चार लाख 66 हजार मतों से शिकस्त दी थी। महाजन इस बार चुनाव लडऩा नहीं चाहतीं। भाजपा उनके विकल्प के रूप में मजबूत प्रत्याशी तलाश करने में व्यस्त है।
ये भी पढ़ें: उत्तर भारत में हुए कमजोर तो दक्षिण में बढ़ाएंगे पैठ मोदी
गांधीनगर: गुजरात की राजधानी गांधीनगर की सीट पर भाजपा पिछले नौ चुनाव में जीत दर्ज करती आ रही है। इस सीट से एक बार अटल बिहारी वाजपेयी तो 6 बार लालकृष्ण आडवाणी जीत चुके हैं। पार्टी ने इस बार आडवाणी की जगह अपने अध्यक्ष अमित शाह को मैदान में उतारा है। कांग्रेस ने यहां से डॉ. सी.जे. चावड़ा पर दांव खेला है। देखना दिलचस्प होगा कि गांधीनगर के मतदाता इस बार किसे अपना प्रतिनिधि चुनते हैं।
सूरत: हीरा नगरी के नाम से पहचाने जाने वाली गुजरात की सूरत सीट से भी भाजपा 1989 से विजयी पताका फहराती आ रही है। पार्टी के दिग्गज नेता काशीराम राणा लगातार छह बार इस सीट से सांसद रहे। पिछले चुनाव में पांच लाख 33 हजार मतों से जीतने वाली दर्शका जरदोश पर भाजपा ने फिर दांव खेला है। कांग्रेस ने यहां अशोक अधेवदा को प्रत्याशी बनाया है।
छिंदवाड़ा: मध्यप्रदेश की छिंदवाड़ा सीट कांग्रेस के अभेद किले के रूप में तब्दील हो चुकी है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने इस सीट से नौ बार चुनाव जीता। 1996 के चुनव में उनकी पत्नी अलका नाथ यहां से जीती थीं। पिछली बार की मोदी लहर में भी कमलनाथ एक लाख से अधिक मतों से जीते थे। कांïग्रेस ने इस बार कमलनाथ के पुत्र नकुल नाथ को प्रत्याशी बनाया है। भाजपा ने यहां नाथन शाह पर दांव खेला है।
मालदा: प. बंगाल की मालदा सीट 1980 से कांग्रेस प्रत्याशी को जिताती आ रही है। सन 1980 में एबीए गनी खान चौधरी ने वामपंथी दलों से यह सीट छीनी और लगातार आठ बार जीतते रहे। 2006 में उनके निधन के बाद उनके भाई अबु दसेम खान चौधरी कांग्रेस टिकट पर जीते। 2009 के चुनाव में मालदा सीट मालदा दक्षिण और मालदा उत्तर में बंट गई। इन दोनों सीटों पर भी 2009 व 2014 में कांग्रेस विजयी रही।
मैनपुरी: उत्तर प्रदेश की यह सीट समाजवादी पार्टी की मजबूत सीट मानी जाती है। इस सीट को आठ बार से समाजवादी पार्टी जीत रही है। यहां से चार बार मुलायम सिंह यादव सांसद बने। मुलायम इस बार भी यहां से भाग्य आजमा रहे हैं। इस सीट पर अपना खाता नहीं खोल पाई भाजपा ने यहां प्रेम सिंह शाक्य को टिकट दिया है। पिछले चुनाव में शाक्य यहां सपा प्रत्याशी से तीन लाख से अधिक मतों से हारे थे।
कन्नौज: इत्र नगरी के रूप में जानी जाने वाली कन्नौज सीट भी पिछले सात चुनाव से समाजवादी पार्टी जीतती आ रही है। एक बार यहां से मुलायम सिंह ने जीत दर्ज की तो तीन बार अखिलेश यादव ने परचम फहराया। दो बार से अखिलेश की पत्नी डिंपल यादव जीत रही हैं। समाजवादी पार्टी ने एक बार फिर डिंपल पर भरोसा जताया है।
हैदराबाद: तेलंगाना की यह सीट एआईएमआईएम का गढ़ बन चुकी है। यहां से पार्टी प्रत्याशी सुलतान सलाऊद्दीन ओवैसी लगातार छह बार जीते। उनके बाद उनके पुत्र असदुद्दीन ओवैसी तीन चुनाव से जीत का डंका बजा रहे हैं। पिछली बार उन्होंने भाजपा प्रत्याशी को दो लाख से अधिक मतों से हराया। ओवैसी एक बार फिर मैदान में है। पिछली बार हारे भगवंत राव को भाजपा ने फिर टिकट दिया है।
Indian Politics से जुड़ी Hindi News के अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें Facebook पर Like करें, Follow करें Twitter पर ..
Lok sabha election Result 2019 से जुड़ी ताज़ातरीन ख़बरों, LIVE अपडेट तथा चुनाव कार्यक्रम के लिए Download patrika Hindi News App.