भारत-बांग्लादेश सरहद पर कांग्रेस और वाम की जबरदस्त घेराबंदी

आवेश तिवारी, बांग्लादेश सीमा से
गंगा और कोसी पर बने संकरे पुलों और खस्ताहाल सड़कों पर लगे मीलों लम्बे जाम से लड़कर जब आप बिहार के पूर्णिया जिले के जीरो माइल से आगे बढ़ते हैं तो महज दो किलोमीटर के फासले पर भाषा-बोली, रंग-ढंग, खेती-किसानी, पहनावा सब बदला-सा नजर आता है। जी हां, हम पश्चिम बंगाल के उत्तर दिनाजपुर जिले में हैं। बांग्लादेश सीमा से सटा यह इलाका भारत-पाक विभाजन के बाद से चर्चा में रहा है।
रायगंज को छोड़कर मुर्शिदाबाद और मालदा टाउन की दो लोकसभा सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं का बाहुल्य है। सीमा से सटे मालदा टाउन, मुर्शिदाबाद और फरक्का जैसे शहरों को देखकर आपको जयपुर, लखनऊ, कोलकाता जैसे शहरों की याद आएगी। खासतौर से मालदा टाउन में कोलकाता का अक्स साफ दिखता है। मालदा में व्यापार करने आए अखिलेश सिंह कहते हैं कि आज मालदा में दो-दो आइटी पार्क हैं, एसइजेड है, ऐसा तो हमारे बिहार में भी नहीं है।जब हम इस इलाके के सीमावर्ती गांवों में प्रवेश करते हैं तो पाते हैं कि यहां हाल बेहद बुरे हैं, न सड़कें हैं, न स्वास्थ्य सुविधाएं, ऊपर से बेरोजगारी की वजह से हाल के वर्षों में पलायन तेजी से बढ़ा है। उत्तर प. बंगाल की सीटों पर कांग्रेस और सीपीएम का हमेशा से वर्चस्व रहा है। तमाम कोशिशों के बावजूद प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस वर्चस्व को तोडऩे में नाकामयाब रही हैं।
अगर सीटों के लिहाज से देखा जाए तो प. बंगाल की 42 लोकसभा सीटों में से पिछले चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने 34 सीटों पर कब्जा जमाया था, पर उत्तर बंगाल की चार सीटों मालदा टाउन दक्षिण, मालदा टाउन उत्तर, मुर्शिदाबाद और रायगंज में से एक भी सीट नहीं जीत पाई थीं। सीपीएम ने यहां से रायगंज और मुर्शिदाबाद सीटें जीत ली थीं, वहीं कांग्रेस ने प्रदेश में केवल चार सीटें जीती थीं। इनमें से दो सीटें मालदा टाउन दक्षिण और मालदा टाउन उत्तर उसके हाथ लगी थीं। भाजपा ने इन इलाकों में धीमे-धीमे पांव जमाने शुरू कर दिए हैं।
रायगंज में प्रवेश करते ही चारों तरफ ममता बनर्जी के छोटे बड़े पोस्टर लगे दिखाई देते हैं। दरअसल यहां के हिंदू मतदाताओं को लगता है कि चुनावों के वक्त हिंदू वोट बंट जाते हैं, वहीं मुस्लिम वोटर संगठित होकर जिसको चाहते हैं जीता जाते हैं। क्या किसान, क्या युवा, क्या स्त्रियां, रायगंज के लोग प्रियरंजन दासमुंशी को आज भी याद करते हैं। मुर्शिदाबाद के रामकांतापुर इलाके के एक पार्टी कार्यकर्ता विश्वजीत कहते हैं जो हिंसा होती है वो राजनीतिक है। मुर्शिदाबाद में मुस्लिम मतदाताओं का चुनाव परिणामों पर हमेशा से गहरा असर रहा है लेकिन मंदिर ज्यादा दिखाई देते हैं।
इस सीट पर प्रमुख पार्टियां मुस्लिम उम्मीदवारों पर ही दांव लगाती हैं। पंचगछिया में शिक्षिका हसीना शेख कहती हैं, पिछले चुनाव में हिंदुओं के वोट तृणमूल और भाजपा में बंट गए इसलिए कांग्रेस जीत गई। अगर बीजेपी उम्मीदवार खड़ा नहीं करेगी तो यहां से टीएमसी जीत जाएगी। फरक्का पुल से लेकर मुर्शिदाबाद शहर के मुख्य चौराहे तक गाडिय़ों की लंबी लाइन लगी हुई है। पुल की मरम्मत हो रही है, सो यह जाम अभी महीनों तक चलना है।
यह बात अजीबोगरीब मगर सच है फरक्का से चलकर जब आप मुर्शिदाबाद होते हुए झारखंड की सीमा में प्रवेश करते हैं तो आपको चारों तरफ हजारों हेक्टेयर खेत परती यानी बिना फसल के नजर आते हैं। जनवरी के महीने में यह चीज चौंकाती है। किसान तौफीक बताता है कि इस बार सूखे की वजह से धान की फसल चौपट हो गई। अब पानी नहीं था, सो अगली फसल कैसे लगा पाते? मुर्शिदाबाद के ग्रामीणों का कहना है कि गंगा के पानी का लाभ इस इलाके के लोगों को मिले, उसका कोई उपाय नहीं किया गया, नहीं तो किसानों के दिन बदलते। ऐसा नहीं है यह हाल केवल मुर्शिदाबाद में है, रायगंज जिले में भी यही हाल है। मुर्शिदाबाद के आसित दास जो नदियों पर ही काम कर रहे हैं, कहते हैं कि सिंचाई के साधन उपलब्ध कराने के वादे ख़ूब किए गए हैं लेकिन उन्हें निभाया नहीं जा रहा, हम इस बार ‘जो दे पानी उसको वोट’ अभियान चलाएंगे।
सरहद पर नहीं दिखता कोई ‘छोटा पाकिस्तान’हम बांग्ला देश की सीमा ससानी गोपागंज में हैं। मालदा टाउन से लगभग 15 किलोमीटर भीतर थका देने वाली पूरी तरह से खराब हो चुकी सड़कों से होते हुए जब हम बॉर्डर पर पहुंचते हैं तो बॉर्डर के बाड़ों के पार खेती करते लोग दिखते हैं। सीमा पर बीएसएफ की महिला बटालियन की जवान बताती हैं, सुबह ताला खोलकर इन्हें भीतर भेजा जाता है, शाम को ये खेती कर वापस लौटते हैं। बाड़ों के इर्द-गिर्द गांव है। बादल सिंह दुकान खोलकर बैठे हैं, उनसे पूछा – मोदी जी का विकास यहां पहुंचा कि नहीं? वो घर के भीतर घुसते हैं और आयुष्मान योजना में रजिस्ट्रेशन का कागज लेकर आते हैं। गोपागंज में ज्यादातर मुस्लिमों की आबादी है। यहां सिंटू शेख कहते हैं इस इलाके के हिंदू हों या मुस्लिम, साथ में रहते-खाते हैं, अगर 2016 में कालियाचक में थाना फूंकने की घटना को छोड़ दिया जाए तो कभी इस इलाके में हिंदू-मुस्लिम विवाद नहीं हुआ। कालियाचक, वैष्णवनगर विधानसभा में ही है। शहरी इलाकों में कहा जाता है कि कालियाचक ‘छोटा पाकिस्तान’ है लेकिन गोपागंज के मुसलमान कहते हैं यह बात राजनीतिक फायदे के लिए उड़ाई गई है। मालदा में भाजपा की अग्निपरीक्षामालदा के ग्रामीण इलाकों में कोई धर्म है तो गरीबी। पूर्व रेल मंत्री स्वर्गीय गनी खान चौधरी को आज भी मालदा टाउन के लोग शिद्दत से याद करते हैं। गनी खान यहां से आठ बार सांसद रहे। 2009 में मालदा टाउन को दो सीटों में बांट दिया गया। अब एक सीट पर गनी खान चौधरी के बेटे अबू हासिम खान चौधरी और दूसरे पर भांजी मौसम नूर का कब्जा है। योगी आदित्यनाथ ने यहीं बालुरघाट रैली को फोन पर संबोधित किया।