ग्राउंड रिपोर्ट: यहां राजनीति मतलब ‘गन्ना’,  लोग गन्ने से सीधे, राजनीति जलेबी सी टेढ़ी

मुकेश केजरीवाल, कैराना। ‘सामने खेत में लगा गन्ना देख रहे हैं। कैसा सीधा है। यहां के लोग भी ऐसे ही सीधे-सपाट हैं। मगर हमारे यहां की राजनीति तो एकदम जलेबी सी हैै। गोल-गोल।’ 52 साल के गन्ना किसान कंवरपाल अपने ही अंदाज में कहते हैं। कैराना से 25 किलोमीटर दूर बुटराड़ा गांव के अपने खेेत में ये गन्नेे की फसल काट रहे थे। हमसे बातचीत के लिए इन्होंने आस-पास के किसानों को भी बुला लिया है।
भुगतान में देरी सबसे बड़ी समस्या
युवा किसान वरुण जावला कहते हैं, ‘हमारे यहां तो चुनाव का मतलब है गन्ना।’ यूं तो गन्ने की अहमियत पूरे उत्तर प्रदेेश में है, लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जिन आठ सीटों पर पहले चरण में चुनाव हो रहे हैं, इसे ‘चीनी का कटोरा’ या ‘गन्ना लैंड’ भी कहा जाता है। पिछले चुनाव में तो पूरा कटोरा भाजपा के पास ही गया था, लेकिन गन्ना भुगतान को ले कर किए गए वादे से जगी उम्मीद अब कुछ-कुछ गुस्से में भी बदल रही है। सबसे बड़ी समस्या है भुगतान में देरी। किसानों का कहना है कि जिन्होंने नवंबर में अपना गन्ना मिल को पहुंचा दिया उनका भुगतान अब तक बाकी है। बस ये मिल से मिली पर्ची को संभाले फिरते हैं। पिछले साल के अंत में यहां के किसानों ने इन्हीं बातों को ले कर बड़ा दिल्ली मार्च किया था।
लागत बढ़ती है, फसल की कीमत नहीं
किसानों की परेशानियां गिनाने को सुदेश चौधरी भी आतुर हैं। कहते हैं ‘1050 रुपये का डीएपी का कट्टा इस बार 1450 का हो गया।’ पास खड़े बुजुर्ग किसान इसमें जोड़ते हैं, ‘पहले तो कट्टे में 10 धड़ी (50 किलोग्राम) खाद होती थी। अब उसे 9 धड़ी (45 किलोग्राम) कर दिया। हम किसान क्या ‘बेवकूफ’ हैं।’ इनकी शिकायत है कि खाद, बीज, कीटनाशक, बिजली सभी की कीमत हर सीजन बढ़ती है, लेकिन गन्ने की कीमत इस बार एक रुपये नहींं बढ़ाई गई। ऊपर से आवारा पशुओं की समस्या लगातार बढ़ती जा रही है। लेकिन ये अपनी राजनीति के चक्कर में इस बारेे में भी कुछ करने को तैयार नहीं।
कुछ की है अलग राय
हालांंकि बगल के रास्ते से अपने ट्रैक्टर से जा रहे रामजीवन इनसे सहमत नहीं। वे कहते हैं, ‘सरकार ने पेमेंट में काफी सुधार करवाया है और चीनी मिलें भी खुलवा रही है। थोड़ा समय तो लगेगा।’ इसी जिले से विधायक और प्रदेश के गन्ना मंत्री सुरेश राणा भी मानते हैं कि किसानों को कुछ समस्या है, लेकिन दावा करते हैं, ‘राज्य और केेंद्र की सरकारोंं ने जितना गन्ना किसानों के लिए किया है, उतना आज तक कभी नहीं हुआ। राज्य सरकार बनने के बाद से अब तक गन्ना किसानों का 60,000 करोड़ का भुगतान हो चुका है। पिछले साल देश में चीनी ज्यादा हुई तो सरकार ने 30 लाख टन बफर स्टॉक की व्यवस्था की। 55 रुपये टन की सब्सिडी दी और साथ ही चीनी मिलों को आसान लोन दिए।’
‘वोट जाति-बिरादरी पर ही’
यहां से 75 किलोमीटर दूर बागपत के टटीरी गांंव की मुख्य सड़क पर चाय की दुकान पर चौपाल जमीं तो यहां भी किसान अपनी शिकायतों का पिटारा खोल कर बैठ गए। पिछले नवंबर में किसानों के दिल्ली मार्च में शामिल रहे अजय चौधरी कहते हैं ‘ये जितने लोग अभी किसानी केे नाम पर बोल रहे हैं। वोट जाति-बिरादरी पर ही करेंगे।’
हालांंकि भारतीय किसान यूनियन के प्रमुख नरेश टिकैत इससे सहमत नहीं। वे कहते हैं, ‘यह बात सही है कि राजनेता हमेशा सेे किसानों को मूर्ख बनाते रहे हैं। लेेकिन अब किसान इन्हें सबक सिखाएंगे। हमारे मुद्दों की अनदेखी अब येे और नहीं कर पाएंगे।’ राज्य योजना आयोग केे पूर्व सदस्य और किसान जागृति मंच के प्रमुख सुधीर पंवार भी कहते हैं, ‘इस बार किसान अपनी समस्याओं को समझ रहा है और यही सबसे प्रभावी मुद्दा होनेे वाला है।’ आगे मुख्य मार्ग पर गन्ने लदी ट्रैक्टर ट्रालियों की लंबी कतार में मौजूद सोहनपाल कहते हैं, “साल भर खून-पसीने से गन्ना हम उगाते हैं लेकिन मिठास तो सारी नेता ही उड़ा ले जाते हैं।”
फिर कसौटी पर विपक्ष का ‘कैराना मॉडल’
पिछले मई में विपक्षी एकता का ‘कैराना मॉडल’ सामने आया जब यहां गठबंधन की एकजुटता ने भाजपा के विजय रथ को पंक्चर कर दिया। इसके बाद देश भर में विपक्ष की एकता का पर जोर दिया जाने लगा।
जाट राजनीति की विरासत भी दांव पर
यहां के गन्ना किसानों के मुद्दे पर राजनीति कर चरण सिंह प्रधानमंत्री तक बने। जाट राजनीति के दम पर ही उनके बेटे अजित सिंह ने भी देश की राजनीति में अपनी जगह बनाई। लेकिन पिछलेे चुनाव में वे खुद तीसरे स्थान पर पहुंच गए और पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली। इस बार उन्हें सपा और बसपा ही नहीं कांग्रेस का भी समर्थन है।
पश्चिमी यूपी की अर्थव्यवस्था का आधार गन्ना
देश का 48 फीसदी गन्ना और 50 फीसदी चीनी उत्तर प्रदेश में ही पैदा होती है। पश्चिमी यूपी की अर्थव्यवस्था गन्ने की फसल और उसके भुगतान पर आधारित है। आज भी गन्ना किसानों के 10,000 करोड़ का भुगतान बकाया है। केंद्रीय मंत्री वीके सिंह, महेश शर्मा, सत्यपाल सिंह और पूर्व मंत्री संजीव बालियान भी मैदान में।