अबकी बार ‘प्रशांत किशोर’ पर सबकी नजर, चुनावी राजनीति पर कितना डाल पाएंगे असर?

नई दिल्‍ली। अभी तक एक रणनीतिकार के रूप में लोकसभा और विधानसभा चुनावों पर छाप छोड़ने वाले प्रशांत किशोर (पीके) अबकी बार सियासी मैदान में दोहरी भूमिका में हैं। एक तरफ उनके ऊपर बिहार में एनडीए के लिए 2014 जैसा प्रदर्शन दोहराने की जिम्‍मेदारी है तो दूसरी तरफ जेडीयू के नेता और सीएम नीतीश कुमार के भरोसे पर भी खरा उतरना है। इतना ही नहीं, बिहार में एक राजनेता के रूप में उनकी पहचान एनडीए की सफलता पर निर्भर करेगी। यही वजह है कि अभी से उनके बारे में यह चर्चा होने लगी है कि क्‍या ‘पीके’ इस बार भी पहले वाला चमत्‍कार कर पाएंगे?
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फिलहाल इस बात से मिली राहत
फिलहाल उनके लिए राहत की बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने चारा घोटाले मामले में आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव को स्‍वास्‍थ्‍य के आधार पर जमानत देने से इनकार कर दिया है। ऐसा इसलिए कि आरजेडी प्रमुख को जमानत मिलने पर उन्‍हें कई तरह की मुश्किलों का सामना चुनाव के दौरान करना पड़ता।
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बिहार में बेहतर प्रदर्शन की उम्‍मीद
बता दें कि कुछ महीने पहले तक प्रशांत किशोर उर्फ पीके की पहचान केवल एक चुनावी रणनीतिकार की थी लेकिन जेडीयू में बतौर दूसरे नंबर यानी राष्‍ट्रीय उपाध्‍यक्ष की जिम्‍मेदारी मिलने और पार्टी की प्रारंभिक सदस्‍यता ग्रहण करने के बाद से वो एक राजनेता भी बन गए हैं। इसलिए जेडीयू मुखिया और भाजपा के चाणक्‍य अमित शाह को उनसे बिहार में पहले से ज्‍यादा बेहतर प्रदर्शन की उम्‍मीद है।
 नीतीश की नीतियों को दे रहे हैं धार
दरअसल, पीके ने 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन की जीत में अहम भूमिका निभाई थी। उनके इस प्रदर्शन से मोदी लहर को 2014 के बाद पहली बार झटका लगा था। इससे पहले वह गुजरात विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव 2014 में भाजपा की जीत में अहम भूमिका निभा चुके हैं। वर्तमान में वह पार्टी के बेहतर प्रदर्शन को सुनिश्चित करने के लिए सीएम नीतीश की सियासी चाल को धार देने में जुटे हैं।