अनंत मिश्रा, कन्याकुमारी से
भारत का आखिरी छोर यानी कन्याकुमारी। हिन्द महासागर, बंगाल की खाड़ी और अरब सागर के संगम स्थल के रूप में पहचाने जाने वाले कन्याकुमारी के सागर से उठने वाली लहरें देश की राजनीति को हमेशा से संदेश देती आई है। देश की राजनीति पर भले उत्तर प्रदेश का बोलबाला रहता आया हो, लेकिन तमिलनाडु ने भी अनेक मौकों पर ‘दिल्ली की सत्ता’ को सहारा भी दिया है और ‘धराशायी’ भी किया है। पिछले लोकसभा चुनाव में जयललिता के नेतृत्व वाली अन्नाद्रमुक (एआइएडीएमके) ने 39 में से 37 सीटों पर कब्जा जमाकर अपने चिर प्रतिद्वंद्वी द्रमुक (डीएमके) का सफाया कर दिया। पर साढ़े चार साल में तमिलनाडु की राजनीति एकदम बदल गई है। फिल्मी पर्दे से आकर राजनीति के मंच पर दशकों तक चमकने वाले दो सितारे एम. करुणानिधि और जे. जयललिता दुनिया छोड़कर जा चुके हैं।
2014 के लोकसभा चुनाव में देश जब मोदी लहर के रथ पर सवार था, तब तमिलनाडु में ‘अम्मा’ (जयललिता) की लहर में सभी दल साफ हो गए थे। लेकिन चार महीने में होने वाले लोकसभा चुनाव में राज्य की राजनीतिक तस्वीर अभी धुंधली नजर आ रही है। द्रमुक का नेतृत्व करुणानिधि के पुत्र स्टालिन के हाथों में आ चुका है तो अन्नाद्रमुक की असली बागडोर को लेकर संशय बना हुआ है। ओ पन्नीरसेल्वम, वर्तमान मुख्यमंत्री ई पलानीस्वामी अथवा दिनाकरण में नेतृत्व की होड़ मची हुई है। द्रमुक में भी करुणानिधि के बड़े पुत्र अलागिरी, स्टालिन को नेता मान नहीं पा रहे। राज्य की राजनीति में भाजपा का बड़ा वजूद नहीं है। पिछले चुनाव में कन्याकुमारी लोकसभा सीट जीतकर भाजपा ने पैठ बनाने की कोशिश की थी। इस बार भी पार्टी मोदी-शाह के करिश्मे के बूते अपनी ताकत बढ़ाने के प्रयास में है। जहां तक सवाल कांग्रेस का है, लंबे समय से वह द्रमुक के सहयोगी की भूमिका में चुनाव लड़ती आ रही है। 2014 में कांग्रेस को यहां एक भी सीट नहीं मिली थी।
इस बार का चुनाव राज्य में नए समीकरणों को भी जन्म दे सकता है। पुराने राजनीतिक दलों के साथ-साथ तमिल सिनेमाई पर्दे के दो बड़े अभिनेता भी राजनीति में आए शून्य को भरने के लिए कूद पड़े हैं। रजनीकांत और कमल हासन के तमिलनाडु में लाखों फैंस हैं। अपनी लोकप्रियता भांपने के लिए दोनों अभिनेता अपने-अपने राजनीतिक दल मैदान में लाए हैं। मतदाता पुराने राजनीतिक दलों पर विश्वास करेंगे अथवा नए समीकरणों पर मुहर लगाएंगे, देखना दिलचस्प रहेगा।
कौन-सा दल, किधर जाएगा
तमिलनाडु की राजनीति के दो बड़े किरदार रहे हैं द्रमुक और अन्नाद्रमुक। दोनों दल दिल्ली की राजनीति को लेकर रवैया समय के साथ बदलते रहे हैं। 1996 से 2004 तक अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार को द्रमुक व अन्नाद्रमुक ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष समर्थन दिया था। जयललिता के समर्थन खींचने से वाजपेयी सरकार गिरी भी थी। दिलचस्प है कि लोकसभा चुनाव के बाद ये दल किसके पाले में जाएंगे? फिलहाल द्रमुक, यूपीए का सहयोगी है। अन्नाद्रमुक अभी किसी के साथ नहीं है, लेकिन अपरोक्ष रूप से भाजपा के नजदीक दिखती है। स्टालिन और मोदी के बीच पर्दे के पीछे की मुलाकातें भी यहां चर्चा में है।
उत्तराधिकार के लिए संघर्ष
एआइएडीएमके का गठन 1972 में डीएमके से अलग होकर एमजी रामचंद्रन ने किया था। एमजीआर के नाम से लोकप्रिय रहे रामचंद्रन ने 1987 पार्टी का नेतृत्व किया। 1987 में उनकी मृत्यु के बाद पार्टी में एक धड़ा एमजीआर की पत्नी जानकी रामचंद्रन और दूसरा धड़ा जे. जयललिता बना और अंतत: जयललिता ने 1989 से 2016 तक पार्टी का नेतृत्व किया। 2017 में जयललिता की मृत्यु के बाद अब पन्नीरसेल्वम – पलानीस्वामी और दिनाकरन को गुट के बीच उत्तराधिकार का संघर्ष चल रहा है। वहीं डीएमके में करुणानिधि की मृत्यु के बाद उनके पुत्रों अलागिरी व स्टालिन में संघर्ष की स्थिति बन रही है।
रजनीकांत बनाम कमल हासन
तमिलनाडु की राजनीति पर दशकों से फिल्मी सितारों का बोलबाला रहा है। शिवाजी गणेशन से एमजी रामचंद्रन और करुणानिधि से जयललिता अपने करिश्मे से मतदाताओं के मानस को पढ़ने और समझने में कामयाब रहे। इस बार रजनीकांत और कमल हासन राजनीति के अखाड़े में कूद रहे हैं। बड़ा सवाल है कि क्या ये दोनों सितारे करुणानिधि और जयललिता की जगह ले पाएंगे। इनका फिल्मी करिश्मा राजनीति में कितना चलेगा, सबकी निगाहें लगी हैं। रजनीकांत को भाजपा के नजदीक, तो कमल हासन को भाजपा के विरोध में माना जाता है।
विधानसभा चुनाव भी साथ संभव
ड्राई फ्रूट्स के थोक विक्रेता अयप्पा का मानना है कि राज्य के राजनीतिक हालात ऐसे हैं कि लोकसभा के साथ विधानसभा चुनाव होने के आसार भी बन रहे हैं। उनकी राय है कि इस बार यहां द्रमुक का पलड़ा भारी रहेगा। कारण ये कि जयललिता के निधन के बाद अन्नाद्रमुक में कोई नेता ऐसा नहीं, जिसका पूरे राज्य में प्रभाव हो, जबकि स्टालिन बड़े नेता हैं। वहीं फैंसी आइटम विक्रेता दलपत राजपुरोहित का साफ मानना है कि तमिलनाडु में इस बार राजनीति अस्थिर है, लेकिन कोई चमत्कार भी हो सकता है। दोनों बड़े दल खींचतान में व्यस्त हैं और फिल्म अभिनेता भी अखाड़े में कूद रहे हैं। स्थिरता आने में कुछ समय लगेगा।
द्रमुक दो दशक बाद फिर जीरो पर
लोकसभा चुनाव 2014 में एआइएडीएमके ने अपना सबसे बेहतर प्रदर्शन किया। 39 में से 38 सीटें जीतने में सफल रही। कांग्रेस को अब तक के सबसे कम 5.31 फीसदी वोट मिले और पार्टी कोई सीट नहीं जीत पाई। डीएमके दो दशक बाद फिर शून्य पर सिमटी। इससे पहले 1999 के लोकसभा चुनाव में भी डीएमके कोई सीट नहीं जीत पाई थी। एनडीए ने 2 सीटें जीती, जिनमें 1 भाजपा और 1 पीएमके ने जीती।