राजेश कसेरा, पणजी से
सत्ता, साख और संघर्ष के पेच में फंसी गोवा की राजनीति में पिछले पांच साल में भाजपा ने जहां अपना मजबूत जनाधार खो दिया है वहीं कांग्रेस गोवा के लोगों में अपना भरोसा बहाल नहीं कर पा रही है। ऐसे में दो सीट वाले गोवा लोकसभा चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा और कांटे का मुकाबला तय है। गोवा की दोनों सीटें जहां भाजपा की सत्ता वापसी में मजबूत आधार बनेंगी, वहीं कांग्रेस सेंध लगाने की पूरी कोशिश में है। क्षेत्रीय दलों की भूमिका भी चुनाव में अहम साबित होगी। मनी और मसल पॉवर में उलझे गोवा में सबका साथ-सबका विकास का नारा नहीं गूंज पाया। केन्द्र और राज्य में भाजपा सरकार होने के बावजूद लोग समस्याओं से जूझ रहे हैं। युवा रोजगार की मांग को लेकर मुखर हैं तो आमजन अटके पड़े कार्यों से परेशान।
गत लोकसभा चुनाव में जनता के अपार समर्थन से दोनों सीटों पर जीत दर्ज करने वाली भाजपा को महज पौने तीन साल बाद विधानसभा चुनाव में जनता ने कांग्रेस से पीछे धकेल दिया, लेकिन पूरा बहुमत उसे भी नहीं दिया। भाजपा ने जोड़-तोड़ से सरकार तो बना ली लेकिन गठबंधन की सरकार का जहाज अब तक हिचकोले खा रहा है। मौजूदा राजनीतिक घटनाक्रम देखें तो भाजपा को लोकसभा चुनाव में कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ेगा तो कांग्रेस को भी बिखरी हुई पार्टी को एक मंच पर लाने के लिए जमकर पसीना बहाना पड़ेगा।
राज्य में अभी तक क्षेत्रीय दल मौकापरस्त ही रहे हैं। वे सत्तारूढ़ दल से जुड़कर सत्ता का सुख भोगते रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, शिव सेना, लेफ्ट दलों के अलावा अन्य क्षेत्रीय दलों ने अपनी जड़ों को सींचने का काम तो किया, पर जनता का साथ नहीं पा सके। गोवा के राजनीतिक हलकों में यह बात खुलकर कही जाती है कि समस्याओं से घिरे प्रदेश में जनता के हित में आवाज उठाने के बजाय विपक्ष की चुप्पी के पीछे बड़ी वजह मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर के पास सबकी कमजोरियों की फाइलों का होना है। गत लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के चलते उत्तर गोवा से श्रीपद नाइक तो दक्षिण गोवा से नरेन्द्र सवाईकर को जनता का आशीर्वाद मिला। इसके बाद 2017 में विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को समर्थन तो मिला लेकिन वह सरकार बनाने में विफल रही। कांग्रेस के आधे दर्जन नेता भाजपा में शामिल हो गए और जनादेश को धक्का पहुंचा।
भाजपा——–
ताकतकेन्द्रीय योजनाओं का प्रचार और राज्य के विकास कार्यपीएम नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह पर भरोसासीएम मनोहर पर्रिकर की बीमारी का भावनात्मक,संवदेनशील पहलूक्षेत्रीय दलों का सहयोग मिलना
कमजोरीराज्य में मनोहर पर्रिकर जैसी दमदार छवि के नेता का अभावबहुजन समाज की अंदरखाने तक फैली नाराजगीसरकार में शामिल नेताओं के दल बदलने की प्रवृत्तिसहयोगियों का भरोसेमंद न होना
कांग्रेस——-
ताकतभाजपा का लगातार कमजोर प्रदर्शन सामने आनायुवा टीम के हाथों में पार्टी की कमान सौंपनालोकसभा चुनाव से पहले आक्रामक तेवर अपनानाभाजपा के वोटर की नाराजगी
कमजोरीयुवा टीम का वरिष्ठों के साथ तालमेल का अभावभाजपा की कमजोरियों को समय पर उजागर नहीं करनानेताओं को भाजपा या अन्य दलों में जाने से नहीं रोक पानाभ्रष्टाचार पर विरोध नहीं करना