दौलत सिंह चौहान, जगदलपुर से
कुख्यात झीरम घाटी का वह स्थान, जहां नक्सलियों ने 25 मई 2013 को करीब २९ कांग्रेसी नेताओं व कार्यकर्ताओं को मौत के घाट उतारा था, आज भी विकटतम भौगोलिक परिस्थितियों के चलते भय मिश्रित अचरज की वजह बना हुआ है। आजाद भारत के इतिहास के सबसे बड़े माओवादी हमले की गुत्थी अभी तक अनसुलझी हैं।नरसंहार के साढ़े पांच साल बाद नए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल मामले की नए सिरे से जांच के लिए बस्तर के आइजी विवेकानंद सिन्हा के नेतृत्व में एसआइटी का गठन कर चुके हैं। उन्होंने केंद्र सरकार से एनआइए की जांच रिपोर्ट राज्य सरकार को उपलब्ध कराने के लिए भी कहा है।
मुख्यमंत्री बघेल का कहना है कि घटना राजनीतिक साजिश का हिस्सा थी। सरकार नई एसआइटी से मामले की जांच करवा कर गुनहगारों को सजा दिलवाएगी। आगामी लोकसभा चुनाव में यह मुद्दा बन सकता है। सिन्हा कहते हैं, मामले की जांच शुरू हो गई है। जांच के बिंदु क्या हैं इस सवाल पर वे कहते हैं, ‘प्रारंभिक स्तर पर होने के कारण जांच के बारे में ज्यादा कुछ नहीं कह पाऊंगा।’
लखमा सबसे बड़े आदिवासी नेता: घटना के छह माह बाद हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार से भाजपा के उन आरोपों पर जनता की मोहर लग गई कि जघन्य कांड कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति के कारण हुआ। इस तरह मामले की जांच का सवाल ही दफन हो गया। नरसंहार में बच निकले कवासी लखमा और पिता नंदकुमार पटेल और भाई दिनेश पटेल को को खो चुके उमेश पटेल झीरम कांड के साढ़े पांच साल बाद सत्तारूढ़ कांग्रेस सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं। सलवा जुडूम के प्रणेता कांग्रेसी नेता महेंद्र कर्मा (जो पहले वामपंथी थे) की मौत के बाद अब कवासी लखमा ही कांग्रेस में सबसे बड़े आदिवासी नेता हैं।
अब आरोप साबित करने की घड़ी: अब जब राज्य में कांग्रेस की सरकार बन गई है, न केवल मृतकों के परिजन बल्कि राज्य की जनता भी चाहेगी कि मामले की जांच अंजाम तक पहुंचे। राज्य के स्कूली शिक्षा मंत्री उमेश पटेल ने भी उम्मीद जताई है कि अब जांच किसी नतीजे तक अवश्य पहुंचेगी। ऐसे में अगले लोकसभा चुनाव से पहले अगर मौजूदा सरकार इस दिशा में कोई ठोस प्रगति नहीं कर पाती है तो जांच से जुड़े सवाल राजनीतिक रूप से उसके गले की हड्डी भी बन सकते हैं। आगामी लोकसभा चुनाव को देखते हुए कांग्रेस की प्राथमिकता घोषणा-पत्र में किए वादों को पूरा करने की है।पहली बार उखड़ी भाजपा: राज्य के गठन के बाद अब तक हुए तीन लोकसभा चुनावों में कुल 11 सीटों में से हर बार स्कोर भाजपा-10, कांग्रेस-1 रहा। लगातार तीन विधानसभा चुनावों में भाजपा के हाथों हार के बाद इस बार 2018 में कांग्रेस राज्य में अब तक के सबसे बड़े बहुमत 90 में से 68 सीटें लेकर सत्ता में आई। ऐसे में लोकसभा चुनाव बघेल सरकार के लिए बड़ा और कड़ा इम्तिहान साबित होंगे।
वादों पर टिकी है जनता की नजर: जहां तक मुद्दों का सवाल है, छत्तीसगढ़ में जनता का ध्यान फिलहाल पूरी तरह राज्य सरकार के वादों पर टिका है। दूसरी तरफ, राज्य में रमन सरकार और उसके कामकाज को क्योंकि जनता ने नकारा, ऐसे में भाजपा आगामी लोकसभा चुनावों में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के कामकाज के आधार पर ही लोकसभा चुनावों में उतरेगी। संगठन इसके लिए खुद को तैयार करने में जुटा है। देखना दिलचस्प होगा कि नतीजे पिछले तीन लोकसभा चुनावों जैसे रहते हैं या कांग्रेस विधानसभा की तरह प्रदर्शन दोहरा पाती है।
खतरा बरकरारजगदलपुर से 45 किमी दूर दरभा गांव के पास झीरम घाटी तक जाते समय देखा कि झीरम से 10-12 किमी पहले एनएच 221 अचानक संकरी और दोनों तरफ से कटी-फटी सड़क में तब्दील हो गया। जगदलपुर से मेरे साथ चले हमारे साथी अजय श्रीवास्तव ने बताया कि नक्सली इसे चौड़ा नहीं करने दे रहे और एनएचएआइ उनके दबाव के आगे असहाय है। यह हिस्सा फिर से किसी वारदात का सबब बन सकता है।